मिस्र निर्माण प्रक्रिया खातों

मिस्र निर्माण प्रक्रिया खातों

1. आविर्भाव के विभिन्न स्वरूप और पक्ष

जैसे कि पहले बताया जा चुका है, सृष्टि के प्रारंभिक क्रियाओं के फलस्वरूप ऊर्जा का सार्वभौमिक आव्यूह अस्तित्व में आया और इसके सिलसिलेवार प्रभाव के फलस्वरूप ब्रह्मांड बना। इस आव्यूह में संगठित सोपान होता है। अस्तित्व के सोपान का प्रत्येक स्तर साक्षात् ईश्वर है—जिसकी रचना उसके स्तर के ठीक ऊपर वाले स्तर पर मौजूद चेतना ने की है। अस्तित्व के प्रत्येक चरण के द्वारा किया जाना वाला आत्म-चिंतन उसके बाद के चरण को अस्तित्व में लाता है। इस प्रकार, ऊर्जा का सोपान परस्पर संबंधित होता है, तथा प्रत्येक स्तर अपने से नीचे वाले स्तर पर कायम रहता है। ऊर्जा के इस सोपान को, आपस में गहराई से संबंधित प्राकृतिक नियमों के विस्तृत आव्यूह में, बड़े ही सुव्यवस्थित ढंग से सेट किया गया है। यह भौतिक और आध्यात्मिक दोनों होता है।

संसार की उत्पत्ति और उसके सृजन में भाग लेने वाले नेतेरु (देवी-देवता) की प्रकृति, मिस्रवासियों के लिए निरंतर रुचि का विषय रहा।

प्राचीनमिस्रवासियोंकेपासब्रह्माण्डसंबंधीशिक्षणकेचारमुख्यकेन्द्रथेः  हेलिओपोलिस, मेम्फिस, थेबेस, औरख्मुनु (हर्मोपोलिस)।प्रत्येककेन्द्रनेउत्पत्तिकेमूलचरणोंयापक्षोंमेंसेकिसीनकिसीकोउद्घाटितकिया।सृजनकेऐसेसभीविवरणोंमें, ब्रह्मांडकीऊर्जाआव्यूहके/मेंक्रमबद्धगठनकोलेकरसभीएकमतहैं।

 

2. मिस्र का ब्रह्माण्ड विज्ञान और रूपक

सार्वभौमिक नियमों की एक पूर्ण और सटीक समझ के आधार पर मिस्री सभ्यता की समग्रता निर्मित हुई थी। उनकी यह गहन समझ, नियमित, सुसंगत और परस्पर संबधित प्रणाली में प्रकट होती है, जहां कला, विज्ञान, दर्शन और धर्म आपस में गुँथे हुए थे, और एक मूलभूत इकाई के रूप में लागू होते थे।

मिस्र का ब्रह्माण्ड विज्ञान सुसंगत, वैज्ञानिक और दार्शनिक सिद्धांतों पर आधारित है। ब्रह्माण्ड संबंधी प्राचीन मिस्री ज्ञान को एक कहानी के रूप में व्यक्त किया गया था, जो भौतिक और आध्यात्मिक अवधारणाओं, दोनों को व्यक्त का एक बेहतरीन तरीका है। कोई भी अच्छा लेखक या व्याख्याता इस बात को जानता है कि कहानियाँ किसी चीज के व्यवहार की व्याख्या करने के लिए प्रदर्शनी की तुलना में कहीं ज्यादा बेहतर साबित होती हैं, क्योंकि इनके अलग-अलग अंशों का एकदूसरे के साथ और समूचे कहानी के साथ आपसी संगति को मस्तिष्क कहीं अधिक आसानी के साथ सहेज लेता है। जानकारी जबतक समझ में तब्दील नहीं हो जाती, तब तक वो बेकार होती है।

मिस्री आख्यानों ने तथ्यात्मक जातिवाचक संज्ञाओं और विशेषणों को, व्यक्तिवाचक मगर संकल्पनात्मक संज्ञाओं (गुणों के संकेत) में बदल दिया। इसके अलावा, उनका मानवीकरण किया गया ताकि उन्हें सुसंगत और सार्थक आख्यानों में बुना जा सके। मानवीकरण करना उनके इस ज्ञान पर आधारित था, कि ईश्वर की छवि से मनुष्य निर्मित हुआ है, अतः मानव सृष्टि की समस्त निर्मित छवि का प्रतीक है।

रूपक, ज्ञान प्रदान करने के लिए जानबूझकर चुना गया एक साधन है। रूपक, ब्रह्मांडीय नियमों, सिद्धांतों, प्रक्रियाओं, संबंधों तथा कार्यों को नाटकीयता प्रदान करता है, और उन्हें समझना आसान बनाता है। रूपक का भीतरी अर्थ जब एकबार खुल जाता है, तो वे वैज्ञानिक और दार्शनिक पूर्णता और संक्षिप्तता के चमत्कार बन जाते हैं। वे जितना अधिक पढ़े जाते हैं, उतना अधिक समृद्ध होते चले जाते हैं। प्रत्येक कहानी में पिरोए गए शिक्षाप्रद ‘आंतरिक आयाम’, श्रोता के विकास की अवस्था के अनुसार, ज्ञान की अनेकों परतें खोलने में सक्षम होते हैं। जैसे ही कोई उच्चतर अवस्था में विकसित होता है, ‘राज़’ की परतें खुलती चली जाती हैं। हम जितना ऊँचा जाते हैं, उतना ही ज़्यादा देख पाते हैं। जो कि हमेशा से वहीं पर होता है।

मिस्रवासियों (प्राचीन मिस्रवासी और वर्तमान बलदी) ने कभी अपने रूपकों को ऐतिहासिक तथ्य नहीं माना। उन्होंने, कहानियों के पीछे छिपी सच्चाई पर विश्वास किया।

इस पुस्तक में, चार मानवीकृत अवधारणाओं-इसिस, ओसिरिस, होरस, और सेत के माध्यम से, कहानी के रूप में कई विषयों को बताया जाएगा। इस प्रकार के चार विषय होंगेः

1 – इसिसऔरओसिरिस, सौरएवंचंद्रतत्वोंकाप्रतिनिधित्वकरेंगे।

2 – संसारकेचारतत्वों (जल, अग्नि, पृथ्वी, औरवायु) कोक्रमशःओसिरिस, सेत, इसिसऔरहोरसकेरूपमेंप्रस्तुतकियाजाएगा।

3 – ओसिरिस और इसिस एवं उनके बेटे होरस, तथा उसके चाचा सेत, की पौराणिक कथा में आदर्ष सामाजिक ढांचे को व्यक्त किया गया है।

4 – ज्योतिष और त्रिकोणमिति, के साथ-साथ ही त्रिमूर्ति/त्रय/त्रिकोण की ब्रह्मांडीय भूमिका समकोण त्रिभुज 3:4:5 के समान होती है, जिसे पिता (ओसिरिस), मां (इसिस), और बेटे (होरस), के बीच रिश्ते के रूप में दर्शाया गया है।

मिस्रवासियों द्वारा शानदार तरीके से लिखे गए रहस्यमय नाटक, ज्ञान प्रदान करने के लिए जानबूझकर चुने गये साधन हैं।

अर्थ और रहस्यमय अनुभव, घटनाओं की शाब्दिक व्याख्या से बंधे हुए नहीं रहते।

आख्यानकाभीतरीअर्थजबएकबारखुलजाताहै, तोवेवैज्ञानिकऔरदार्शनिकपूर्णताऔरसंक्षिप्तताकेचमत्कारबनजातेहैं।

वे जितना अधिक पढ़े जाते हैं, उतना अधिक समृद्ध होते चले जाते हैं।

एवं आख्यान में पिरोए गए होने के कारण, न तो कभी अंश को संपूर्ण समझे जाने की गलती हो सकती है, और न ही इसके कार्यात्मक महत्व को विस्मृत या विकृत किया जा सकता है।

 

3. सृजन चक्र के तीन प्राथमिक चरण

प्राचीन मिस्री ग्रंथों में, सृजन चक्र के अनुक्रम को तीन प्राथमिक चरणों में चित्रित किया गया है। ठीक इसी चित्रण को बाद में सूफ़ी (तथा अन्य) लेखनों में दोहराया गया।

इस प्रकार के त्रिआयामी चित्रण के तीन मुख्य प्राचीन मिस्री स्रोत निम्नलिखित हैं:

पिरामिड लेखः कम से कम 5,000 साल पुराने पिरामिड लेखों में, सृजन चक्र के तीन चरणों के समान ही, देवताओं की तीन समूहों का वर्णन है, जिसके प्रत्येक समूह में 9 नेतेरु (देवी-देवता) शामिल थे। पिरामिड लेखों में, 9 नेतेरु (देवी-देवता) के एक समूह (नौरत्न), या 2 समूह या 3 समूहों का बार-बार उल्लेख किया गया है।

मिस्री लेख नौरत्न के तीन समूहों की बात करते हैं—जिसमें से प्रत्येक सृष्टि चक्र के एक चरण का प्रतिनिधित्व करता है। नौ प्रत्येक चरण की संख्या है—प्रत्येक चरण 9 की संख्या में अगले चरण को जन्म देता है।

पहला (महान) नौरत्न, संकल्पनात्मक या दिव्य चरण का प्रतिनिधित्व करता है। यह रे द्वारा शासित होता है।

दूसरा नौरत्न, अभिव्यक्ति वाले चरण का प्रतिनिधित्व करता है। यह ओसिरिस द्वारा शासित होता है।

तीसरा नौरत्न, स्रोत की ओर वापसी वाले चरण का प्रतिनिधित्व करता है—यह ओसिरिस और रे दोनो का संयोग करता है।

ओसिरिस और रे दोनों की आत्माओं का मिलन हो जाता है और वे एक इकाई बन जाती हैं, उजाले में आने की पुस्तक, में बहुत ही अर्थपूर्ण ढंग से इसका वर्णन किया गया हैः

            मैं उसके जोड़े में उसकी दो आत्मा हूँ।

रे की स्तुतिः एक संक्षिप्त प्रस्तावना के बाद स्तुति में, रे के स्वरूपों की पचहत्तर स्तुतियाँ हैं, जिसके बाद प्रार्थना और भजन की एक श्रृंखला है, जिसमें रे और ओसिरिस की पहचान पर लगातार ज़ोर डाला गया है।

प्राचीन मिस्री ग्रंथों पर, ओसिरिस तथा रे का निरन्तर चक्र हावी है। पहले चरण में रे की स्वरूपों में अभिव्यक्ति है। दूसरे चरण में ओसिरिस की स्वरूपों में अभिव्यक्ति आती है। तीसरा और अंतिम चरण, दो क्षितिजों के नए रे-हेराखुति को एकसाथ मिलाने एवं पुनर्जीवित करने के लिए पाताल में घटित होता है।

लीडेन पेपिरस जे350: यह प्राचीन मिस्री दस्तावेज कम से कम प्राचीन राजवंश (2575–2150 ई.पू.) जितना पुराना है, जिसकी एक प्रति की पुनर्रचना, 13वीं सदी ई.पू. रेमसेस द्वितीय के शासनकाल के दौरान हुई।

लीडेन पेपिरस जे350, में सृष्टि के प्राचीन आख्यान के तात्विक पहलुओं का वर्णन करने वाली विस्तारित रचनाएं हैं। पेपिरस की गणना की प्रणाली, सृष्टि के तत्वों/पक्षों की पहचान करती है, तथा प्रत्येक इसके प्रतीकात्मक संख्या के साथ मेल खाती है।

यह पांडुलिपि ‘पदों’ की संख्यांकित श्रृंखलाओं में बंटी हुई है, तथा इनमें प्रत्येक का शीर्षक ”भवन, (चाँद के) संख्या …” के रूप में है।

वैसे मिस्री पेपिरस की गणना प्रणाली अपनेआप में स्वयं महत्वपूर्ण है। वे तीन श्रेणियों में विभाजित होती हैं- पहली श्रेणी 1 से 9 की होती है, फिर दूसरी श्रेणी भौतिक स्वरूप के ऊर्जावान नींव का गठन करने के लिए 10, 20, 30, 90 के घातों में होती हैं–और तीसरी श्रेणी सैकड़े (100) वाली संख्याओं की होती है।

इस गणना प्रणाली से सृष्टि के तीन चरणों से पता चलता है।

1. पहला चरण है गर्भकाल/नौरत्न का, जिसका विषय अविभेदित ऊर्जा/पदार्थ से घिरा एक ऐसा क्षेत्र है, जिससे संसार की उत्पत्ति होने वाली है।

2. क्रमबद्ध अभिव्यक्ति की अवस्था/नौरत्न वाला दूसरा चरण, उत्पन्न जगत के दो भव्य उप विभाजनों, प्रतिभासिक और तात्विक समतलों से संबधित है।

3. पुनर्मिलन/नौरत्न वाले तीसरे चरण का विषय, स्रोत की ओर वापसी तथा उसके बाद होने वाली पुनः एकीकरण की प्रक्रिया है, जो नएअल्फा (आरंभ) कीओरजातीहै।

(सृष्टि चक्र के तीनों चरणों की विस्तृत जानकारी के लिए मुस्तफा गदाला द्वारा लिखित इजिप्शियन अल्फाबेटिकल लेटर्स आफ क्रिएशन साइकिल  देखें।)

 

[इसका एक अंश: मिस्र का ब्रह्मांड विज्ञान: सजीव ब्रह्मांड , तीसरा संस्करण द्वारा लिखित मुस्तफ़ा ग़दाला (Moustafa Gadalla) ] 

पुस्तक सामग्री को https://egypt-tehuti.org/product/%E0%A4%AE%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B0-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%AC%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%B9%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A3%E0%A5%8D%E0%A4%A1-%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%9C%E0%A5%8D/

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