स्वर्गीय सीढ़ी पर चढ़ना – पृथ्वी के बाद जीवन

स्वर्गीय सीढ़ी पर चढ़ना –

पृथ्वी के बाद जीवन

1.आत्मा का पारगमन

जन्म और पुनर्जन्म के विचारों के प्रति मिस्रवासियों की तन्मयता —लगभग सनक की हद तक— उनकी अंत्येष्टि संबंधी विश्वासों का एक मूलभूत तत्व थीः पुनर्जन्म मृत्यु पश्चात अस्तित्व के चरणों में से एक था। मिस्री लेखों में स्पष्ट रूप से कहा गया है, कि आत्मा स्वर्ग में है, शरीर धरती में है (पेपी प्रथम का मकबरा), अर्थात उन्होंने भौतिक शरीर के फिर से जिंदा होने की कभी अपेक्षा नहीं की थी।

“दूसरे जन्म” के बारे में प्रथम ज्ञात संदर्भ, उजाले में आने की पुस्तक के CLXXXIIवें अध्याय में मिलता है, जिसमें ओसिरिस को इस प्रकार संबोधित किया गया है,

वह (ओसिरिस) जो पुरुषों और महिलाओं को दूसरी बार जन्म देता है।

हेरोडोटस के अनुसार, इंसान की आत्मा अमर है, इस विचार का पालन सबसे पहले मिस्रवासियों ने किया पारगमन के सिद्धांत का उल्लेख प्लूटार्क, प्लेटो तथा अन्य प्राचीन लेखकों द्वारा भी मिस्रवासियों की आम धारणा के रूप में किया गया है, और इसे पाइथागोरस और उनके गुरू फेरेसाइडेस, के साथ-साथ अन्य यूनानी दार्शनिकों द्वारा भी अपनाया गया।

 

2. प्रदर्शन का मूल्यांकन

निर्देश की पुस्तक में, एक मिस्री राजा अपने राजकुमार बेटे, को सर्वोच्च गुणों को हासिल करने की सलाह देता है, क्योंकि जब उसकी मौत होगी तो उसे पल भर में ही अपना पूरा जीवन दिख जाएगा, तथा न्यायाधीशों द्वारा उसके धरती के प्रदर्शन की समीक्षा होगी और मूल्यांकन किया जाएगा। यहाँ तक कि छठवें राजवंश जितने प्राचीन समय में भी, हमें यही सोच मिलती है कि स्वर्ग, उन लोगों के लिए आरक्षित है, जिन लोगों ने धरती पर इंसानों और दिव्य शक्तियों के प्रति अपने कर्तव्यों को सही ढंग से निभाया। राजा हो या कोई और, इसमें कोई भी अपवाद नहीं था।

उदाहरण के लिए, फ़िरऔन यूनस (2323 ई.पू.) को भी धरती से स्वर्ग की ओर उड़ान भरने की तब तक इजाज़त नहीं थी, जब तक नेतेरु (जो उसकी मदद करने वाले थे) उसके नैतिक मूल्यों की सच्चाई से संतुष्ट न हो जाएं। उनकी मांग थी, कि धरती पर कोई भी मनुष्य उसके खिलाफ एक शब्द न बोलता हो,  और न ही स्वर्ग में नेतेरु (देवताओं) के समक्ष उसके खिलाफ कोई शिकायत आयी हो।  इस प्रकार, यूनस के लेख में हम पढ़ते हैं:

धरती पर यूनस के खिलाफ लोगों ने कुछ नहीं कहा
उस पर स्वर्ग में नेतेरु (देवी-देवताओं) के समक्ष पाप का आरोप नहीं लगा।

जैसा कि पहले बताया जा चुका है, प्राचीन मिस्रवासी अपने आध्यात्मिक विश्वासों को कहानी के रूप में, किसी पवित्र नाटक या रहस्य नाटक की तरह व्यक्त करते थे। निम्नलिखित रहस्य नाटक मिस्रवासियों द्वारा न्याय दिवस की प्रतीकात्मक प्रस्तुति है।

1. मृतक की आत्मा को दोहरे स्वरूप वाली मा-आत के न्याय कक्ष में पेश किया जाता है। वह दोहरे स्वरूप वाली है, क्योंकि तराजू तभी संतुलन में होता है, जब दूसरे पलड़े पर विरोधी बल भी समान मात्रा में मौजूद हो। मात का प्रतीक शुतुरमुर्ग का पंख है, जो निर्णय या सच का प्रतिनिधित्व करता है। परम्परा के अनुसार उसका पंख तराजू पर रखा होता है।

2. मार्ग को खोलने वाले के रूप में, अनुबिस, मृतक को तराजू का पथ प्रदर्शित करता है तथा हृदय को तौलता है।

 

1. Ma-at, 2. Anubis, 3. Amam (Ammit), 4. Thoth,

5. The deceased, 6. Horus, 7. Osiris, 8. 42 Judges/Assessors

 

मृतककेभाग्यकानिर्धारणकरनेकेलिए, उसकेहृदयको-जोउसकेअन्तःकरणकारूपकहै- सत्यकेपंखकेखिलाफतौलाजाताहै।

3. आसन पर आरूढ़ ओसिरिस—न्याय कक्ष का सभापति होता है। पंचायत में 42 न्यायाधीश/मूल्यांकनकर्ता होते हैं। प्रत्येक न्यायाधीश के पास विशिष्ट पाप या गलती के लिए विशिष्ट न्यायाधिकार होता है; तथा सभी अपने सिर पर सत्य का पंख धारण किए रहते हैं।

4. मृतक की आत्मा अपने निर्धारित न्यायाधीश के समक्ष 42 नकारात्मक स्वीकारोक्तियों को पढ़ कर, प्रत्येक पाप/गलती को करने से इनकार करती हैं। ये नकारात्मक स्वीकारोक्ति उजाले में आने की

पुस्तक (जिसे आमतौर पर मृतकों की पुस्तक के गलत नाम से जाना जाता है) के अध्याय cxxv में मौजूद है।

निर्दिष्ट पंच/न्यायाधीश, उस स्त्री या पुरुष को मा-खेरु (सत्य वचन/कर्म) घोषित करके उसे स्वीकार किए जाने की घोषणा करते हैं।

42 नकारात्मक स्वीकारोक्तियों के अनुवाद इस प्रकार हैं। इनमें से कुछ का दोहराया जाना प्रतीत हो सकता है, लेकिन इसका कारण है, मूल भाषा के सटीक अर्थ और अभिप्राय का अनुवाद कर पाने में असमर्थ होना।

  1. मैंने अधर्म नहीं किया है।
  2. मैंने हिंसा के साथ लूटपाट नहीं किया है।
  3. मैंने चोरी नहीं की है।
  4. मैंने किसी की हत्या नहीं की है; मैंने किसी का नुकसान नहीं किया है।
  5. मैंने चढ़ावे में कोई धोखा नहीं किया है।
  6. मैंने दायित्वों को घटाया नहीं है।
  7. मैंने नेतेरु को नहीं लूटा है।
  8. मैंने झूठ नहीं बोला है।
  9. मैंने अपशब्द नहीं बोला है।
  10. मैंने दर्द नहीं पहुँचाया है।
  11. मैंने व्यभिचार नहीं किया है।
  12. मैंने किसी को रुलाया नहीं है।
  13. मैंने धोखा नहीं दिया है
  14. मैंने कभी अतिक्रमण नहीं किया।
  15. मैं छल के साथ पेश नहीं आया।
  16. मैंने जुती ज़मीन को कभी बर्बाद नहीं किया है।
  17. मैंने कभी आड़ मे छिपकर बातें नहीं सुनी।
  18. मैंने कभी (किसी भी इंसान के खिलाफ) अपने होंठ नहीं चलाए।
  19.  न्याय के उद्देश्य के अलावा मैंने कभी क्रोध और रोष नहीं किया है।
  20.  मैंने किसी भी इंसान की पत्नी को अशुद्ध नहीं किया है।
  21. मैं गुस्सैल इंसान नहीं था।
  22.  मैंने अपने आप को प्रदूषित नहीं किया है।
  23. मैंने आतंक नहीं फैलाया है।
  24. मैं क्रोधोन्माद में नहीं जला।
  25.  मैंने सही और सत्य वचनों (माआत) के लिए अपने कान बंद नहीं किये।
  26.  मैंने दुःख का काम नहीं किया है।
  27.  मैंने गुस्ताखी वाला काम नहीं किया है।
  28.  मैंने कलह को बढ़ावा नहीं दिया है।
  29.  मैंने जल्दबाजी में फैसला नहीं किया है।
  30.  मैंने विशिष्टता की मांग नहीं की।
  31.  मैंने कभी बात को ज्यादा बढ़ायाचढ़ाया नहीं।
  32.  मैंने तो नुकसान पहुँचाया है और ही बुरा किया है।
  33.  मैंने राजा को शाप नहीं दिया है। (अर्थात नियमों का उल्लंघन)
  34.  मैंने पानी अशुद्ध नहीं किया है।
  35.  मैंने तिरस्कार की बात नहीं की है।
  36.  मैंने कभी नेतेरु को शाप नहीं दिया है।
  37.  मैंने चोरी नहीं की है।
  38.  मैंने नेतेरु के चढ़ावे में कोई धोखा नहीं किया है।
  39.  मैंने धन्य मृतक के चढ़ावे को नहीं लूटा है।
  40.  मैंने शिशु का भोजन नहीं चुराया है।
  41.  मैंने अपने पैतृक शहर के नेतेर के प्रति अपराध नहीं किया है।
  42.  मैंने गलत इरादे से नेतेर के पशु का वध नहीं किया है।

5. जैसे अनुबिस हृदय को सत्य के पंख के मुकाबले तौलता है, वैसे नेतेरु (देवी-देवता) का लिपिक, थोथ, फैसले को अभिलेख के रूप में दर्ज करता है। उसका दो में से कोई एक परिणाम होता हैः

a. क) अगर पलड़े संतुलित नहीं हैं, तो इसका मतलब है कि उस मनुष्य ने अपना जीवन केवल पदार्थ के रूप में बिताया है। फलस्वरूप, अमाम (अम्मित) उस हृदय को खा जाएगा। अमाम एक परिवर्तनशील संकर नस्ल है।

गैर सिद्ध आत्मा का धरती पर आगे के विकास हेतु अगला अवसर प्रदान करने के लिए एक नये भौतिक वाहन (शरीर) में, फिर से जन्म हो जाएगा (पुनर्जन्म)। जीवन/मृत्यु /नवीकरण का यह चक्र तब तक जारी रहता है, जब तक आत्मा, धरती पर अपने जीवनकाल के दौरान उन 42 नकारात्मक स्वीकारोक्तियों को पूरा करने में सिद्ध नहीं हो जाती।

ख) अगर दोनों पलड़े पूरी तरह से संतुलित होते हैं, तब ओसिरिस अनुकूल निर्णय देता है, और अंततः माखेरु (सत्य वचन) घोषित करता है।

सिद्ध आत्मा इसके बाद परिवर्तन और पुनर्जन्म की प्रक्रिया से होकर गुजरती है। वह आत्मा किस स्वर्ग की स्तर (2-6) को प्राप्त करेगी, यह उस आत्मा के मूल्यांकन के नतीजे पर निर्भर करता है।

 

3. कायांतरण पाठ

प्राचीन मिस्र के सभी कायांतरण (अंत्येष्टि) लेखों का यही एक उद्देश्य था, कि जिस व्यक्ति के लिए उन्हें लिखा एवं उसका पाठ किया जा रहा है, उसके लिए पुनर्जीवन और अमरता हासिल की जा सके। मृतक के अनुसार लेखों की सामग्री और शैली अलग-अलग तरह की होती थीं। कोई भी दो व्यक्तियों के कायांतरण (“अंत्येष्टि”) लेख कभी एक जैसे नहीं हुआ करते थे। इन लेखों को प्रत्येक व्यक्ति के मार्ग के आधार पर तैयार किया जाता था। इसी प्रकार के व्यक्ति आधारित लेख हमें तथाकथित ‘जादुई’ पपायरी में भी देखने को मिलते हैं। मिस्री लेखों में इंसान के सांसारिक अस्तित्व से विभिन्न आध्यात्मिक स्थानों के लिए, कायांतरण होने की प्रक्रिया के चरणों का विस्तार से वर्णन मिलता है।

मृतकों की पुस्तक के गलत नाम से मशहूर, उजाले में आने की पुस्तक, (पेर-एम-ह्रू), में इन सभी विषयों का विवरण प्रचुरता से मिलता है। इसमें अलग-अलग लंबाई वाले एक सौ से अधिक अध्याय हैं, जो यूनस के सक्कारा के कायांतरण (अंत्येष्टि) लेखों से काफी करीब से जुड़े हैं। इस किताब को अपने पूर्ण रूप में, केवल मृतक के साथ ममी में लपेट कर दफनाये गये पेपिरस के गट्ठरों में पाया जा सकता है।

अन्य कायांतरण (तथाकथित अंत्येष्टि और धार्मिक) लेखन भी, यूनस के उपर्युक्त कायांतरण अंत्येष्टि (पिरामिड) लेखों के साथ निकटता से संबंधित हैं। एक ही मूल विषय, जीवन/मृत्यु/पुनर्जन्म का अन्वेषण हर पाठ/लेखन करता है, अर्थात मृत्यु के बाद दुअत के क्षेत्र में आत्मा के कायांतरण का एक अलग कोण से पड़ताल करता है। चूँकि कोई भी दो व्यक्ति एक जैसे नहीं होते हैं, इसलिए कोई दो कायांतरण पाठ भी एक जैसे नहीं होते हैं। इन रचनाओं को, दुअत (या पाताल) में क्या है-की पुस्तक, द्वार की पुस्तक, गुफाओं की पुस्तक, रा की स्तुति, अकेर की पुस्तक, दिन की पुस्तक, और रात  की पुस्तक के नाम से जाना जाता है।

 

4. नए स्थान में प्रवेश

सांसारिक अस्तित्व के दौरान हासिल की गई उपलब्धि के मूल्यांकन के परिणाम के आधार पर दिवंगत आत्माएं विभिन्न स्थानों की ओर जाती हैं।

कायांतरण लेख, प्रक्रिया को गति प्रदान करते हैं, जिसके द्वारा नई आत्मा एक स्थान से दूसरे स्थान की ओर प्रगति करती हैं। उसे और आगे बढ़ने से पहले अन्य सभी अर्हताओं को पूरा करना एवं स्वीकृत होना आवश्यक होता है। किसी नए स्थान में प्रवेश पाने के लिए, उस स्थान के निवासियों को लगना चाहिए कि नवागंतुक उनमें शामिल होने या उस स्थान से गुजरने के योग्य है। आत्माओं के संसार में निवासियो के अधिकार भौतिक संसार के समान ही होते हैं। (इस पुस्तक के पूर्व अध्याय में विवरण देखें।)

नवागंतुक को उच्च से उच्चतर स्थान की ओर जाने के लिए प्रत्येक स्थान के निवासियों की स्वीकृति और सहायता दोनों की जरूरत पड़ती है। इसलिए, सक्कारा स्थित यूनस के मकबरे (रुब्बल पिरामिड) में, हम देखते हैं कि उच्च स्थानों के निवासी —उजाले वाले लोग— यूनस (~ 2323 ई.पू.) को योग्य पाते हैं, और इस प्रकार वे उसे स्वीकार करते हैं, तथा उसे अपने बीच रहने एवं आगे चढ़ने में मदद करते हैं;

उक्ति 336

उजाले वाले लोग उसकी गवाही देते हैं;
आकाश से अभिवादन के फुहारे उस पर बरसते हैं।
वे यूनस को रे की ओर चढ़ने देते हैं।

उक्ति 377

यूनस को तेरी महक आती है, नेतेरु, (देवी-देवता)
तुझे यूनस की महक आती है, नेतेरु,
यूनस तेरे पास रहे, नेतेरु,
यूनस के तू पास रहे, नेतेरु,
यूनस तेरे साथ रहे, नेतेरु,
यूनस के तू साथ रहे, नेतेरु,

 

5. महिमा

प्राचीन मिस्र के ग्रंथों में, साकार आत्मा महिमा प्राप्त करता है और दिव्य मूल में शामिल हो ।

साहसिक यात्रा की एक लंबी श्रृंखला के बाद, पुनर्जीवित आत्मा, उचित और पुनर्जीवित, neteru के परिजन में एक जगह प्राप्त करेंगे (देवताओं, देवी)-ब्रह्मांडीय बलों-और अंततः गतिविधि है कि ब्रह्मांड परमिट के गुणवान दौर में भाग लेने एक निरंतर अस्तित्व ।

प्राचीन मिस्र के ग्रंथों में, साकार आत्मा महिमा प्राप्त करता है और दिव्य मूल में शामिल हो । उसी तरह, बाइबल हमें बताती है कि यीशु ने अपनी मौत और पुनरुत्थान के बाद ही महिमा हासिल की है:

… भगवान, कि उसे मरे हुओं में से उठाया और उसे महिमा दी.. । [मैं पीटर, 1:21]

महिमा वैभव और भव्यता का उज्ज्वल सौंदर्य है — स्वर्ग या स्वर्ग का आनंद — जो सर्वोच्च उपलब्धि से प्राप्त होता है । महिमा एक हेलो या प्रकाश के एक वृत्त के रूप में कलाकृति में प्रतिनिधित्व किया है । प्राचीन मिस्र में, नेतेर (परमेश्वर) पुनः प्रकाश का प्रतिनिधित्व करता है और एक वृत्त के रूप में दर्शाया गया है ।

मृत्यु और पुनरुत्थान के चक्र के बीच का संबंध ओसीरिस के “नाम” के मिस्र रूप में परिलक्षित होता है, जो औसरके दो अक्षरों के होते हैं-ऑस्ट्रेलिया-रा। नाम के पहले अक्षर (aus-Ra) ऑस्ट्रेलिया या ओएसका उच्चारण है, जिसका अर्थ है “शक्ति, शक्ति हो सकता है” । नेतेर (ईश्वर) के नाम का अर्थ है कुछ की ताकत जैसे री. इस अर्थ में नेतेर (ईश्वर) ओसी़स का सच्चा सार वर्णन करता है.

ऑस्ट्रेलिया-राके चक्र में, औसर (ओसीरिस) चंद्रमा के साथ, मृतकों के रात क्षेत्रों की रोशनी की पहचान की है । औसर के प्रकाश, सूर्य के रूप में उनकी अभिव्यक्तियों में से एक में, आरए (आरई) का एक प्रतिबिंब है ।

औसर (चंद्रमा के प्रस्थान के अनुरूप, चंद्र महीने के अंत के निकट) मर गया और उसके बाद तीसरे दिन पुनर्जीवित किया गया । तीसरे दिन एक नए चांद की शुरुआत यानी नए सिरे से ऑसर। यह ईस्टर उत्सव की याद ताजा करती है, जहां औसरकी तरह, बाइबिल यीशु शुक्रवार को मर गया और तीसरे दिन (रविवार) एक नया जीवन के रूप में पुनर्जीवित किया गया ।

औसर (ओसीरइस) सिंहासन और आंख के glyph के साथ चित्रलिपि में लिखा है, वैधता और देवत्व की अवधारणाओं के संयोजन ।

रा (Re) आंख के glyph के साथ जुड़ा हुआ है । सबसे विशिष्ट मिस्र का प्रतीक नेत्र है, जो कई जटिल और सूक्ष्म भूमिकाएँ निभाता है. नेत्र शरीर के प्रकाश को अनुभव करने में सक्षम का हिस्सा है, और इसलिए आध्यात्मिक क्षमता के लिए एक प्रतीक है ।

रा (इ) ऊर्जा का ब्रह्मांडीय सिद्धांत है जो मृत्यु की ओर अग्रसर होता है और औसर (ओसीर्स) पुनर्जन्म की प्रक्रिया का प्रतिनिधित्व करता है । इस प्रकार, जीवन और मृत्यु की शर्तें विनिमेय हो जाती हैं: जीवन का अर्थ है धीमा मरण; मृत्यु का अर्थ है नए जीवन को पुनर्जीवित करना । मौत में मृत व्यक्ति की पहचान औसरके साथ की जाती है, लेकिन वह जीवन आगै आएगा, और रविंद्रके साथ उसकी पहचान होगी ।

मिस्र के लेखन का वर्णन है कि यह:

सोने का सितारा बन जाता है और पुनः की कंपनी में शामिल हो जाता है, और उसके साथ लाखों साल की अपनी नाव में आकाश भर पाल ।

 

[इसका एक अंश: मिस्र का ब्रह्मांड विज्ञान: सजीव ब्रह्मांड , तीसरा संस्करण द्वारा लिखित मुस्तफ़ा ग़दाला (Moustafa Gadalla) ] 

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